अभी हाल में हुए दिल्ली विश्वविद्यालय के छात्रसंघ के चुनावों में ये बात साफ जाहिर हो गई कि देश के प्रतिष्ठित विश्वविद्यालय में आज भी जात एक सच्चाई है
दिल्ली विश्वविद्यालय के एफिलेटेड कॉलेज से बांदा के चंदेल कुर्मी भाई संदीप सिंह ने पिछली बार चुनाव जीता और बेहतरीन तरीके से अपना कार्यकाल पूरा किया और बांदा में जिला पंचायत सदस्य के चुनाव के तैयारी शुरू कर दी है छात्र राजनीत में अपने लड़के आगे आए तो समाज का ही भला होगा बढ़िया लीडर मिलेंगे, पर DU में फिलहाल कुर्मी समाज अपना अलग खेमे खड़ा करने में नाकामयाब साबित हुआ है,इसके कई कारण हैं
1. संगठित पहचान की कमी
विभिन्न राज्यों के कुर्मी छात्र छात्राओं के सरनेम अलग होते और कुछ तो कॉमन ही होते है जिसे अपनी पहचान नहीं हो पाती है,इसके लिए एक प्लेटफॉर्म को विकसित करने की जरूरत जहां नया छात्र अपने कॉलेज, ब्रांच में अपने सजातीय क्लासमेट,प्रोफेसर आदि की पहचान कर पाए।
2. सही दिशा में शिक्षा में निवेश
अपने समाज के बच्चों को लोकल कॉलेज के बजाए दिल्ली विश्वविद्यालय को वरीयता देनी चाहिए, अपने समाज में मेधावी छात्रों को कमी नहीं पर सही दिशा निर्देशों की भरी कमी है, राजधानी से ग्रेजुएशन करने से गांव और छोटे शहरों से निकले बच्चों को बढ़िया एक्सपोजर मिलता है जिसका फायदा जीवन भर मिलता है।
3. राजनैतिक संरक्षण की कमी
जहां दूसरी बिरादरियों में नेता अपने राज्य से इतर दिल्ली में अपने सजातीय छात्र नेताओं को पूरा सहयोग करते है, वही कुर्मी क्षत्रप अपने क्षेत्र विशेष के बाहर नहीं निकलते है और क्षेत्र विस्तार पर फोकस कम करते है
जिसे न सिर्फ राजनीतिक संरक्षण बल्कि पूंजी की भी कमी नहीं होती
समाज की बात को मजबूती देने के लिए दिए गए QR-CODE पर अपनी क्षमता अनुसार सहयोग अवश्य करें, सहयोग करने वाले सारे भाइयों का नाम वेबसाइट के होम पेज पर अंकित किया जाएगा।
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